मिडिल ईस्ट युद्ध का असर दवाइयों की सप्लाई पर दिखने लगा।
भोपाल। मिडिल ईस्ट युद्ध का असर अब दवा उद्योग पर भी साफ नजर आने लगा है. हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि आने वाले समय में अस्पतालों और स्वास्थ्य विभागों तक दवाओं की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. खासतौर पर एमएसएमई श्रेणी के दवा निर्माता, जो सरकारी आपूर्ति का बड़ा हिस्सा संभालते हैं, बढ़ती लागत के कारण गंभीर दबाव में आ गए हैं।
कच्चे माल की कमी और बढ़ती लागत
वर्तमान स्थिति में दवा निर्माण में उपयोग होने वाले कच्चे माल की उपलब्धता सीमित हो गई है, जिससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है. उद्योग जगत ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग करते हुए टेंडर की समय-सीमा बढ़ाने और राहत पैकेज देने की अपील की है. इसके साथ ही जीवनरक्षक दवाओं के लिए नए दरों पर अलग से शॉर्ट टेंडर जारी करने की जरूरत भी जताई गई है।
एमएसएमई दवा निर्माताओं पर बढ़ा दबाव
स्मॉल और मीडियम ड्रग मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ने सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों में संशोधन करने का आग्रह किया है. उनका कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल, सप्लाई चेन में व्यवधान और सरकारी अनुबंधों की कड़ी शर्तों के चलते छोटे और मध्यम दवा निर्माता संकट में फंस गए हैं।
दवा इकाइयों के बंद होने का खतरा
एसोसिएशन के मुताबिक, यदि जल्द राहत नहीं मिली तो अगले दो से तीन महीनों में कई दवा निर्माण इकाइयों के बंद होने का खतरा है. देश में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को मिलने वाली लगभग 90 प्रतिशत जेनरिक दवाएं इन्हीं एमएसएमई इकाइयों के जरिए उपलब्ध होती हैं।
कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल
एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. दर्शन कटारिया ने बताया कि देश की दवा इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाला करीब 75 प्रतिशत कच्चा माल विदेशों से आता है, जिसकी कीमतों में 30 से 70 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है. वहीं, पैकेजिंग और अन्य सामग्री भी अब नकद भुगतान पर ही मिल रही है, जबकि सरकारी सप्लाई का भुगतान अक्सर महीनों तक लंबित रहता है।
सरकार से राहत और नीतिगत बदलाव की मांग
एसोसिएशन के सचिव अजयसिंह दासुंदी ने सुझाव दिया है कि मौजूदा अनुबंधों की सप्लाई अवधि कम से कम 60 दिन बढ़ाई जाए और देरी पर लगने वाले दंड को फिलहाल स्थगित किया जाए. इसके अलावा, सरकार को बकाया भुगतान जल्द जारी करना चाहिए और जरूरी जीवनरक्षक दवाओं के लिए छह महीने की जरूरत के हिसाब से शॉर्ट टेंडर निकालकर तत्काल भुगतान सुनिश्चित करना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो कई निर्माता आर्थिक रूप से टूट सकते हैं या फिर ब्लैकलिस्ट होने की स्थिति में पहुंच सकते हैं।

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