Green Hydrogen Mission: परमाणु ऊर्जा से हाइड्रोजन उत्पादन की दुनिया की पहली सुविधा शुरू
नई दिल्ली । भारत के स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकी कार्यक्रम ने वैश्विक स्तर पर एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया है। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (आईजीसीएआर) में दुनिया के पहले कॉपर-क्लोरीन (Cu-Cl) थर्मोकेमिकल चक्र आधारित हाइड्रोजन उत्पादन संयंत्र का सफलतापूर्वक शुभारंभ किया है। यह अनूठी और दूरगामी तकनीक परमाणु ऊर्जा से पैदा होने वाली उच्च तापमान वाली ऊष्मा का सीधा उपयोग करती है, जो आईजीसीएआर के फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) से प्राप्त की जा रही है। इस मील के पत्थर साबित होने वाले संयंत्र का उद्घाटन परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव और परमाणु ऊर्जा आयोग (एईसी) के अध्यक्ष अजीत कुमार मोहंती ने आईजीसीएआर के निदेशक श्रीकुमार जी. पिल्लई की गरिमामयी उपस्थिति में किया। मुम्बई स्थित भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी) द्वारा पूरी तरह स्वदेशी रूप से विकसित यह तकनीकी प्रदर्शन इकाई यह सिद्ध करेगी कि परमाणु रिएक्टरों की मदद से बिना कार्बन उत्सर्जन के बड़े पैमाने पर हरित हाइड्रोजन का व्यावसायिक उत्पादन संभव है।
भविष्य का ईंधन और कॉपर-क्लोरीन तकनीक की विशेषता
हाइड्रोजन को वैश्विक स्तर पर आने वाले समय का सबसे महत्वपूर्ण, टिकाऊ और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जा रहा है, जो पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। वैसे तो हाइड्रोजन निर्माण की कई विधियां मौजूद हैं, परंतु कॉपर-क्लोरीन थर्मोकेमिकल चक्र को दुनिया भर में सबसे प्रभावी और उत्तम माना जाता है क्योंकि यह अन्य प्रक्रियाओं की तुलना में बेहद कम तापमान पर काम करता है और इसकी कुल ऊर्जा दक्षता (एफिशिएंसी) कहीं अधिक होती है। इस अत्याधुनिक संयंत्र की स्थापना में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को शोध, ब्लूप्रिंट डिजाइनिंग, विशिष्ट उपकरणों के निर्माण, इंस्टॉलेशन और कड़े परीक्षणों में कई वर्षों का लंबा समय लगा है। बीएआरसी और आईजीसीएआर के साझा प्रयासों से तैयार यह पायलट प्लांट अब वास्तविक परिस्थितियों में काम करेगा, जिससे मिले व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर इस तकनीक को भविष्य में और अधिक परिष्कृत कर इसका औद्योगिक स्तर पर विस्तार किया जाएगा।
परमाणु ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और कार्बन मुक्ति का संकल्प
इस ऐतिहासिक उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अजीत कुमार मोहंती ने कहा कि परमाणु शक्ति को हाइड्रोजन उत्पादन जैसी नवीन स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों के साथ एकीकृत करना भारत के कूटनीतिक और पर्यावरणीय लक्ष्यों के लिए एक युगांतरकारी कदम है। उन्होंने रेखांकित किया कि परमाणु ऊर्जा न केवल बिना कार्बन वाली निरंतर बिजली देती है, बल्कि उच्च क्षमता वाली थर्मल ऊर्जा (गर्मी) भी प्रदान करती है, जो जीवाश्म ईंधन (कोयला-गैस) पर देश की निर्भरता को न्यूनतम करने तथा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को पूरी तरह समाप्त करने में सहायक है। उन्होंने इस वैज्ञानिक विचार को धरातल पर सच कर दिखाने वाली पूरी तकनीकी टीम की सराहना की और कहा कि यह बड़ी सफलता वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती परमाणु अनुसंधान क्षमताओं और आत्मनिर्भरता का एक जीवंत प्रमाण है।
आईजीसीएआर का ऐतिहासिक योगदान और भावी परमाणु रोडमैप
इस अभूतपूर्व परियोजना में अहम भूमिका निभाने वाला आईजीसीएआर संस्थान वर्ष 1971 से ही देश के महत्वाकांक्षी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर कार्यक्रम का नेतृत्व कर रहा है। इसके वैज्ञानिकों ने पिछले 40 से अधिक वर्षों के दौरान फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर के सफल संचालन के माध्यम से उन्नत ईंधन, सोडियम तकनीक और परमाणु सामग्रियों के विकास में अमूल्य योगदान दिया है। एफबीटीआर से प्राप्त इसी बहुमूल्य तकनीकी अनुभव और परिपक्वता ने देश के परमाणु कार्यक्रम को एक बेहद मजबूत आधार दिया है। वर्तमान में इसी तकनीकी विशेषज्ञता के बल पर कलपक्कम में ही 500 मेगावाट क्षमता वाले 'प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर' (पीएफबीआर) के निर्माण का कार्य अंतिम चरणों में है, जो भारत के स्वदेशी त्रि-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे और सबसे महत्वपूर्ण चरण का प्रतिनिधित्व करता है।

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