नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली की सरकार ने गेहूं की खरीद प्रक्रिया में मानकों को लचीला बनाते हुए किसानों को बड़ी राहत देने का ऐलान किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इस फैसले के समय को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता द्वारा गुणवत्ता नियमों में ढील देने की घोषणा उस समय की गई है जब अधिकांश किसान खराब मौसम और असुरक्षा के डर से अपनी उपज पहले ही खुले बाजार में बेच चुके हैं। सरकार का तर्क है कि इस कदम से उन किसानों को सहारा मिलेगा जिनकी फसल प्रतिकूल मौसम के कारण प्रभावित हुई थी, हालांकि किसान संगठनों और मंडी प्रतिनिधियों का मानना है कि यह सहायता पहुंचने में बहुत देर हो चुकी है।

गुणवत्ता मानकों में बड़ी ढील और सरकार की नई रणनीति

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि अब सत्तर प्रतिशत तक चमक की कमी वाले गेहूं के साथ-साथ पंद्रह प्रतिशत तक सिकुड़े और टूटे हुए दानों वाली फसल को भी सरकारी खरीद के दायरे में शामिल किया जाएगा। इस विशेष छूट के अंतर्गत खरीदे जाने वाले अनाज का लेखा-जोखा और भंडारण पूरी तरह अलग रखा जाएगा ताकि उसकी प्राथमिकता के आधार पर निकासी सुनिश्चित की जा सके। प्रशासन का मानना है कि मानकों में यह रियायत किसानों को बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों पर फसल बेचने से रोकने में मददगार साबित होगी और उन्हें उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने में सहायक बनेगी।

देरी से लिए गए फैसले पर अन्नदाताओं की कड़ी प्रतिक्रिया

नरेला अनाज मंडी से लेकर ग्रामीण इलाकों के किसानों तक में सरकार की इस पहल को लेकर असंतोष देखा जा रहा है क्योंकि दिल्ली में गेहूं की बिक्री का सिलसिला अप्रैल की शुरुआत में ही प्रारंभ हो गया था। स्थानीय किसानों का कहना है कि जब उन्हें सरकारी केंद्रों पर खरीद की कोई उम्मीद नजर नहीं आई, तो उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी कम कीमत पर निजी व्यापारियों को अपनी फसल सौंप दी। आढ़तियों के अनुसार जहां सरकारी दर पच्चीस सौ रुपये से ऊपर थी, वहीं किसानों को अपनी मेहनत की उपज मात्र तेईस सौ से चौबीस सौ रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ी, जिसके कारण अब इस नई छूट का लाभ लेने के लिए उनके पास अनाज ही शेष नहीं बचा है।

सीमित उत्पादन और किसानों को हुआ भारी आर्थिक नुकसान

दिल्ली के बाहरी क्षेत्रों जैसे नजफगढ़, बवाना और महरौली में शहरीकरण के दबाव के बावजूद प्रति एकड़ अच्छी पैदावार होती है, लेकिन समय पर खरीद प्रक्रिया शुरू न होने से किसानों को लाखों रुपये का व्यक्तिगत घाटा सहना पड़ा है। कई बड़े काश्तकारों ने व्यथा साझा करते हुए बताया कि एमएसपी पर खरीद की गारंटी न मिलने की वजह से उन्हें अपनी बाईस-तेईस एकड़ की फसल औने-पौने दाम पर निकालनी पड़ी, जिससे उन्हें प्रति किसान तीन लाख रुपये तक का नुकसान हुआ है। यद्यपि सरकार के इस कदम को नीतिगत स्तर पर सराहनीय माना जा सकता है, परंतु जमीनी सच्चाई यही है कि खरीद प्रक्रिया शुरू होने में हुई देरी ने दिल्ली के छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक कमर तोड़ दी है।