हाईवे सुरक्षा बढ़ाने के लिए एनएचएआई की नई तकनीक पर काम तेज
नई दिल्ली: राजमार्ग निर्माण में तकनीकी क्रांति, अब 'डिजिटल ट्विन' और 5D मॉडलिंग से होगी नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट्स की लाइव निगरानी
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) देश में सड़क निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। अब राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण और उनकी गुणवत्ता की जांच केवल कागजों या मौके पर जाकर निरीक्षण करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके लिए एक उन्नत डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। 'हाईवे इंफॉर्मेशन मॉडलिंग प्लेटफॉर्म' (HIMP) के माध्यम से एनएचएआई हर प्रोजेक्ट की वास्तविक समय (रियल-टाइम) में निगरानी कर सकेगा। यह तकनीक सड़क निर्माण की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने से लेकर उसके रखरखाव तक के पूरे सफर को डिजिटल रूप में सहेज कर रखेगी। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य निर्माण कार्य में पारदर्शिता लाना और प्रोजेक्ट्स को समय सीमा के भीतर पूरा करना है।
5D तकनीक से प्रोजेक्ट की लागत और समय का होगा सटीक आकलन
राजमार्गों की निगरानी के लिए अपनाई जा रही यह नई प्रणाली 5D मॉडलिंग तकनीक पर आधारित होगी, जो डिजाइन के साथ-साथ समय और खर्च को एक एकीकृत ढांचे में पिरो देगी। इसके माध्यम से किसी भी सड़क परियोजना का एक आभासी मॉडल तैयार किया जाएगा, जिससे भविष्य में होने वाले बदलावों या संभावित समस्याओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि अब एनएचएआई और अन्य संबंधित विभागों को जमीनी हकीकत जानने के लिए केवल फील्ड विजिट पर निर्भर नहीं रहना होगा। केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म पर डेटा उपलब्ध होने से विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर होगा और फाइलों के अटके रहने की समस्या भी दूर होगी, जिससे निर्णय लेने की गति में क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
देश की आठ चुनिंदा परियोजनाओं से होगी इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत
एनएचएआई ने इस डिजिटल मॉडल के शुरुआती परीक्षण के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से आठ प्रमुख परियोजनाओं का चयन किया है। इन परियोजनाओं में ओडिशा का रामेश्वरम-पुरी-रतनपुर कॉरिडोर, झारखंड और पश्चिम बंगाल को जोड़ने वाला मोरेग्राम-किशनगंज मार्ग और हिमाचल प्रदेश का शिमला-मतौर कॉरिडोर जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट शामिल हैं। इसके अलावा निर्माणाधीन परियोजनाओं में आगरा-ग्वालियर ग्रीनफील्ड बायपास और वाराणसी के गंगा-वरुणा एलिवेटेड कॉरिडोर पर भी इस प्रणाली को लागू किया जाएगा। इन आठ प्रोजेक्ट्स के माध्यम से प्राप्त परिणामों और अनुभवों के आधार पर ही भविष्य में इस डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम को पूरे देश के राजमार्ग नेटवर्क पर विस्तार दिया जाएगा।
विविध भौगोलिक परिस्थितियों में तकनीकी सक्षमता को परखने की तैयारी
इन विशेष परियोजनाओं के चयन के पीछे का मुख्य उद्देश्य अलग-अलग भौगोलिक चुनौतियों में इस सिस्टम की कार्यक्षमता को जांचना है। चाहे हिमाचल के दुर्गम पहाड़ी रास्ते हों, मैदानी इलाके हों या फिर शहरों के बीच बनने वाले एलिवेटेड कॉरिडोर, यह प्लेटफॉर्म हर परिस्थिति में सटीक आंकड़े जुटाने में सक्षम होगा। 'डिजिटल ट्विन' जैसी आधुनिक तकनीक पर आधारित होने के कारण यह सिस्टम किसी भी निर्माण कार्य का एक वर्चुअल प्रतिरूप तैयार कर देता है, जिससे लागत और निर्माण की गुणवत्ता में होने वाले किसी भी विचलन को तुरंत पकड़ा जा सकेगा। यह पहल न केवल भारतीय राजमार्गों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर सड़क निर्माण की सर्वोत्तम प्रथाओं को भारत में स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगी।

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